अक्तूबर 2026
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की कुंभी चीनी मिल इन दिनों पूरे इलाके में चर्चा का केंद्र है। यहां बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (BCML) देश का पहला औद्योगिक स्तर का पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) बायोपॉलिमर प्लांट तैयार कर रही है, जिसमें गन्ने से पर्यावरण के अनुकूल, सड़ने वाली प्लास्टिक बनाई जाएगी। 22 अक्तूबर 2026 को 308 पहियों वाला विशाल हाइड्रोलिक ट्रक प्लांट की बहुप्रतीक्षित मशीन लेकर मिल परिसर पहुंचा, तो लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्थान | कुंभी चीनी मिल परिसर, गोला गोकर्णनाथ क्षेत्र, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश |
| कंपनी | बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (BCML) |
| ब्रांड | बलरामपुर बायोयुग (Balrampur Bioyug) |
| उत्पाद | पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA), गन्ने से बनी बायोप्लास्टिक |
| वार्षिक क्षमता | लगभग 80,000 टन |
| अनुमानित निवेश | करीब ₹2,850 करोड़ (कुछ रिपोर्टों में ₹3,080 करोड़ तक) |
| रोज़गार | लगभग 225 प्रत्यक्ष और 2,000 से अधिक अप्रत्यक्ष |
| तकनीकी साझेदार | सुल्ज़र (Sulzer) और अल्पाइन इंजीनियरिंग |
308 पहियों वाले महाट्रक का भव्य स्वागत
गुरुवार, 22 अक्तूबर 2026 को 308 पहियों वाला विशेष हाइड्रोलिक ट्रक कुंभी चीनी मिल पहुंचा। ट्रक को देखने के लिए ग्रामीणों और आसपास के लोगों की भारी भीड़ जुटी। मिल के मुख्य महाप्रबंधक सुनील यादव ने नारियल फोड़कर मशीन का पूजन किया और उसका स्वागत किया गया।
इतनी भारी मशीन के लिए रास्ता आसान बनाने के लिए लखीमपुर-मोहम्मदी मार्ग पर पड़ने वाले स्मृति द्वार और साइनेज बोर्ड क्रेन की मदद से हटाए गए। मशीन के सुरक्षित पहुंचते ही मिल प्रशासन ने उसे स्थापित करने की तैयारी शुरू कर दी है।
क्या है PLA बायोप्लास्टिक?
पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) एक बायोडिग्रेडेबल यानी जैविक रूप से सड़ने वाली बायोप्लास्टिक है। साधारण प्लास्टिक पेट्रोलियम से बनती है, जबकि PLA गन्ने जैसी पौधों से मिलने वाली शर्करा से तैयार की जाती है।
- कंपनी के अनुसार यह 100 प्रतिशत जैव-आधारित और औद्योगिक कंपोस्टिंग योग्य होगी।
- उपयुक्त परिस्थितियों में यह कुछ महीनों में प्राकृतिक रूप से विघटित हो सकती है। ध्यान रहे, यह तेज़ी से सड़ने के लिए आम तौर पर औद्योगिक कंपोस्टिंग जैसी नियंत्रित स्थितियां चाहती है, खुले में फेंकने से अपने-आप गायब नहीं हो जाती।
- इसे अवायवीय पाचन (anaerobic digestion) से बायोगैस और खाद बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
- एक किलो PLA बनाने में अभी लगभग 1.6 किलो चीनी की ज़रूरत बताई गई है, और तकनीक सुधरने पर यह 1.2 किलो तक आ सकती है।
गन्ने से प्लास्टिक कैसे बनेगी?
सरल भाषा में प्रक्रिया कुछ इस तरह है:
- गन्ने से चीनी तैयार होती है।
- उस चीनी से लैक्टिक एसिड बनाया जाता है।
- लैक्टिक एसिड से PLA बायोपॉलिमर तैयार होता है।
- PLA से पैकेजिंग, डिस्पोज़ेबल सामान और अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
प्लांट मिल के ठीक बगल में बन रहा है, इसलिए कच्चा माल सीधे चीनी मिल से मिलेगा। कंपनी का कहना है कि इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा और आपूर्ति श्रृंखला का प्रबंधन आसान होगा। प्लांट पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा से चलाने की योजना बताई गई है।
अब तक का सफ़र
| समय | पड़ाव |
|---|---|
| अक्तूबर 2024 | उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल ने देश की पहली व्यापक बायोप्लास्टिक नीति को मंज़ूरी दी |
| फरवरी 2025 | कुंभी में प्लांट की आधारशिला रखी गई; ₹2,850 करोड़ के निवेश की घोषणा |
| मई 2025 | मुंबई में ‘बलरामपुर बायोयुग’ ब्रांड का शुभारंभ |
| मई 2026 | कंपनी ने प्रेफरेंशियल शेयरों से ₹450 करोड़ जुटाए, जिनका उपयोग PLA परियोजना और लैक्टोजिप्सम प्लांट में होना है |
| 22 अक्तूबर 2026 | 308 पहियों वाला महाट्रक मशीन लेकर कुंभी पहुंचा, स्थापना की तैयारी शुरू |
कंपनी ने शुरुआत में परियोजना को करीब ढाई साल में पूरा करने की बात कही थी और एक रिपोर्ट में अक्तूबर 2026 के आसपास संचालन शुरू होने का अनुमान था। मशीन की स्थापना और कमीशनिंग के बाद ही असली उत्पादन तारीख साफ़ होगी।
निवेश और फंडिंग
- परियोजना पर कुल लगभग ₹2,850 करोड़ का निवेश बताया गया है।
- फंडिंग का अनुपात लगभग 40 प्रतिशत इक्विटी और 60 प्रतिशत कर्ज़ है।
- कंपनी का लक्ष्य है कि PLA और अन्य गैर-चीनी कारोबार पूरी क्षमता से संचालन शुरू होने के तीन साल के भीतर कुल आय का करीब 50 प्रतिशत योगदान दें।
- PLA उत्पादन के उप-उत्पाद लैक्टोजिप्सम को प्रोसेस करने के लिए लगभग ₹160 करोड़ की अलग इकाई प्रस्तावित है, जिसकी क्षमता सालाना करीब 76 लाख जिप्सम बोर्ड की है।
किसानों, रोज़गार और इलाके को क्या फ़ायदा?
- किसानों के लिए: गन्ने की एक और औद्योगिक मांग बनेगी, जिससे चीनी के अलावा गन्ने का नया उपयोग खुलेगा।
- रोज़गार: मैन्युफैक्चरिंग, R&D और संचालन में करीब 225 सीधी नौकरियां और पूरी वैल्यू चेन में 2,000 से ज़्यादा अप्रत्यक्ष रोज़गार की उम्मीद है।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था: निर्माण, परिवहन, सप्लाई और सेवाओं में काम बढ़ने की संभावना।
- उत्तर प्रदेश की बायो-इकॉनमी: राज्य की बायोप्लास्टिक नीति के तहत यह बड़ी परियोजना राज्य को ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग में आगे ले जा सकती है।
पर्यावरण पर असर
- पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक पर निर्भरता घटेगी।
- कंपोस्टिंग योग्य विकल्प से प्लास्टिक कचरे की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है।
- नवीकरणीय ऊर्जा से संचालन से कार्बन उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बायोप्लास्टिक का असली फ़ायदा तभी मिलेगा जब उसके लिए अलग संग्रहण और औद्योगिक कंपोस्टिंग की व्यवस्था बने।
‘देश का पहला’ या ‘एशिया का पहला’?
कंपनी और सरकारी स्रोत इसे भारत का पहला औद्योगिक स्तर का, पूरी तरह एकीकृत PLA बायोपॉलिमर प्लांट बताते हैं। स्थानीय खबर में इसे ‘एशिया का पहला बायो प्लास्टिक प्लांट’ कहा गया है, पर इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि मुझे नहीं मिली, इसलिए सुरक्षित रूप से ‘देश का पहला’ लिखना ही बेहतर है।
आगे क्या?
- मशीन की स्थापना और ट्रायल रन
- कमीशनिंग और गुणवत्ता जांच
- व्यावसायिक उत्पादन की औपचारिक घोषणा
- लैक्टोजिप्सम प्रोसेसिंग यूनिट का काम
ताज़ा अपडेट के लिए BCML की आधिकारिक वेबसाइट chini.com और स्थानीय समाचार स्रोत देखते रहें।
निष्कर्ष
कुंभी का यह प्लांट भारत में गन्ने के उपयोग को चीनी, इथेनॉल और बिजली से आगे बायोप्लास्टिक तक ले जाने वाला बड़ा कदम माना जा रहा है। 308 पहियों वाले महाट्रक के आगमन ने दिखा दिया कि काम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। अब सबकी नज़र इस पर है कि उत्पादन कब शुरू होता है और यह सड़ने वाली प्लास्टिक बाज़ार में कितना बदलाव ला पाती है।
स्रोत: दैनिक जागरण (अक्तूबर 2026), बलरामपुर चीनी मिल्स की प्रेस विज्ञप्तियां और कंपनी फाइलिंग, यूरोपियन बायोप्लास्टिक्स, बायोफ्यूल्स डाइजेस्ट, केमिकल वीकली, केमिन डाइजेस्ट, स्वराज्य मैग।